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विष्णु पुराण के अनुसार, विष्णु जी सृष्टि के पालनहार हैं और वे क्षीर सागर में वासुकि नाग पर विराजते हैं। भगवान विष्णु की चार भुजाएं हैं जिनमें से एक हाथ में सुदर्शन चक्र, दूसरे में शंख, तीसरे में गदा और चौथी भुजा में पद्म(कमल) है। लेकिन क्या आपको पता है ये चीजें भगवान विष्णु के हाथों में होना मात्र एक आकृति या पहचना के लिये नहीं है। बल्कि भगवान विष्णु ने अपने हाथों में जो चीजें धारण की हैं, उनके पीछे का बहुत अधिक महत्व है।

आइए जानते हैं विष्णु जी द्वारा धारण की वस्तुओं का क्या है महत्व….

सुदर्शन चक्र का महत्व

भगवान विष्णु के एक हाथ में सुदर्शन चक्र दिखाई देता है। सुदर्शन चक्र वास्तव में इस बात का प्रतीक होता है कि व्यक्ति को अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ निश्चयी होना चाहिये। यह इस बात को भी समझाता है कि अपने लक्ष्य को भेदने की शक्ति और दूरदर्शिता के प्रति हमेशा एकाग्र रहें। सुदर्शन चक्र को भगवान विष्णु का अमोघ अस्त्र भी कहा जाता है।

शंख का महत्व

भगवान विष्णु का दूसरा शस्त्र है शंख, शंख की ध्वनि में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसके साथ ही यह भी कहना है कि शंख की ध्वनि व्यक्ति के जीवन में नकारात्मकता कम करती है और सकारात्मकता बढ़ाती है। आध्यात्मिक दृष्टि से शंख से निकलने वाली ध्वनि हमारी अंतरात्मा और चेतना जागृत होती है।

गदा का महत्व

गदा भगवान विष्णु के एक हाथ में रखते हैं और शक्ति प्रदान करते हैं। यह गदा होने का मतलब दुष्टों को डराने से है। दुष्टों को डराने का कार्य इस गदा से किया जाता है। जबकि अच्छे विचारवान लोगों के लिये यह रक्षा का प्रतीक है। भगवान विष्णु के हाथ में गदा ईश्वर की न्याय प्रणाली को दर्शाता है।

पद्म का महत्व

पद्म का अर्थ कमल के फूल से है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कमल का फूल मन में एकाग्रता और सत्यता का प्रतीक माना जाता है। कमल का फूल मानव जीवन को बहुत बड़ी सीख देता है, जिस प्रकार कमल का फूल कीचड़ में रहकर भी खुद को साफ, सुंदर बनाकर रखता है। उसी तरह मानव को भी इस संसार रुपी माया में रहते हुये खुद को पवित्रात्मा और दोषरहित बनाकर रखना चाहिए।

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Rama Ekadashi 2021 : माता लक्ष्मी को समर्पित रमा एकादशी व्रत, जाने महत्व, कथा शुभ मुहूर्त https://astrodeeva.com/rama-ekadashi-2021/ https://astrodeeva.com/rama-ekadashi-2021/#respond Sun, 24 Oct 2021 03:59:32 +0000 https://astrodeeva.com/?p=2605 Rama Ekadashi 2021: हिंदू धर्म में व्रत उपवास का बहुत महत्व है। हर महीने आने वाली एकादशियों का महत्व तो ओर भी अधिक है। हर एकादशी की अपनी एक खास विशेषता होती है। उसी प्रकार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी भी खास है। आइये जानते हैं इसके महत्व, व्रत एवं पूजा विधि के बारे […]

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Rama Ekadashi 2021: हिंदू धर्म में व्रत उपवास का बहुत महत्व है। हर महीने आने वाली एकादशियों का महत्व तो ओर भी अधिक है। हर एकादशी की अपनी एक खास विशेषता होती है। उसी प्रकार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी भी खास है। आइये जानते हैं इसके महत्व, व्रत एवं पूजा विधि के बारे में।

क्यों कहते हैं इसे रमा एकादशी

कार्तिक मास भगवान विष्णु को समर्पित होता है। भगवान विष्णु इस समय शयन कर रहे होते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को ही वो चार मास बाद जागते हैं। लेकिन कृष्ण पक्ष में जितने भी त्यौहार आते हैं उनका संबंध किसी न किसी तरीके से माता लक्ष्मी से भी होता है।माता लक्ष्मी जी का एक नाम रमा भी है इसलिए इस एकादशी को रमा एकादशी कहा जाता है।

रमा एकादशी 2021(Rama Ekadashi 2021)

दिनांक : 01 नवम्बर 2021
वार : सोमवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ – 31 नवम्बर 2021 को 02:27 पी एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त – 01 नवम्बर 2021 को 01:21 पी एम बजे
पारण( व्रत तोड़ने की) तिथि: 2 नवम्बर 2021
पारण ( व्रत तोड़ने का) समय: 06:34 ए एम से 08:46 ए एम
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय – 11:31 ए एम

रमा एकादशी कथा (Legend Of Rama Ekadashi)

अर्जुन ने कहा- “हे श्रीकृष्ण! आप मुझे कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा सुनाइए। इस एकादशी का क्या नाम है तथा इसमें किस देवता का पूजन किया जाता है? इस एकादशी का व्रत करने से किस फल की प्राप्ति होती है?कृपा करके सब विस्तारपूर्वक बतायें”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे अर्जुन! कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम रमा एकादशी है। इसका व्रत करने से सभी पापों का शमन होता है। इसकी कथा इस प्रकार है,

पौराणिक काल में मुचुकुंद नाम का राजा राज्य करता था। सभी देवता उसके मित्र थे। वह बड़ा सत्यवादी तथा विष्णुभक्त था। उसका राज्य बिल्कुल निष्कंटक था। उसकी चन्द्रभागा नाम की एक कन्या थी, जिसका विवाह उसने राजा चन्द्रसेन के पुत्र सोभन से कर दिया। वह राजा एकादशी का व्रत बड़े ही भक्ति भाव से नियमपूर्वक करता था और उसके राज्य में सभी इस नियम का पालन करते थे।

एक बार की बात है कि सोभन अपनी ससुराल आया हुआ था। वह कार्तिक का महीना था। उसी मास में महापुण्यदायिनी रमा एकादशी आ गई। इस दिन सभी व्रत रखते थे। चन्द्रभागा ने सोचा कि मेरे पति तो बड़े कमजोर हृदय के हैं, वे एकादशी का व्रत कैसे करेंगे, जबकि पिता के यहां तो सभी को व्रत करने की आज्ञा है। मेरा पति अगर राजाज्ञा मान कर उपवास करेंगे तो बहुत कष्ट होगा। चन्द्रभागा को जिस बात का डर था वही हुआ। राजा मुचुकुंद ने आदेश जारी किया कि इस समय उनका दामाद राज्य में पधारा हुआ है, अतः सारी प्रजा विधानपूर्वक एकादशी का व्रत करे। उसे सुनकर सोभन अपनी पत्नी के पास गया और बोला – ‘हे प्रिय! तुम मुझे कुछ उपाय बतलाओ, क्योंकि मैं उपवास नहीं कर सकता, यदि मैं उपवास करूंगा तो अवश्य ही मर जाऊंगा।’

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पति की बात सुन चन्द्रभागा ने कहा – ‘हे स्वामी! मेरे पिता के राज्य में एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं कर सकता। यहां तक कि राज्य के पालतू जानवर हाथी, घोड़ा, ऊंट आदि भी अन्न, जल आदि ग्रहण नहीं करते, फिर भला मनुष्य कैसे भोजन कर सकते हैं? यदि आप उपवास नहीं कर सकते तो किसी दूसरे स्थान पर चले जाइए, क्योंकि यदि आप यहां रहेंगे तो आपको व्रत तो अवश्य ही करना पड़ेगा।’

पत्नी की बात सुन सोभन ने कहा – ‘हे प्रिय! तुम्हारी राय उचित है, परंतु मैं व्रत करने के डर से किसी दूसरे स्थान पर नहीं जाऊंगा, अब मैं व्रत अवश्य ही करूंगा, परिणाम चाहे कुछ भी और भाग्य के लिखे को भला कौन टाल सकता है।’

सभी के साथ सोभन ने भी एकादशी का व्रत किया और भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल होने लगा। सूर्य नारायण भी अस्त हो गए और जागरण के लिए रात्रि भी आ गई। वह रात सोभन को असहनीय दुख देने वाली थी। दूसरे दिन सूर्योदय होने से पूर्व ही भूख-प्यास के कारण सोभन के प्राण-पखेरू उड़ गए।

राजा ने सोभन के मृत शरीर को जल-प्रवाह करा दिया और अपनी पुत्री मायके में रहकर एकादशी का व्रत करने और भगवान विष्णु की कृपा पर भरोसा रखने को कहा। चन्द्रभागा अपने पिता की आज्ञानुसार अपने पिता के घर रहकर एकादशी के व्रत करने लगी।

उसके व्रत के प्रभाव से सोभन को जल से निकाल लिया गया और भगवान विष्णु की कृपा से उसे मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से परिपूर्ण तथा शत्रु रहित देवपुर नाम का एक उत्तम नगर प्राप्त हुआ। वह वहां का राजा बन गया। उन्हीं दिनों मुचुकुंद नगर में रहने वाला एक ब्राह्मण तीर्थयात्रा के लिए निकला हुआ था। घूमते-घूमते वह सोभन के राज्य में जा पहुंचा। राजा सोभन को देख ब्राह्मण को आश्चर्य हुआ और सोभन से कहा – ‘हे राजन! आपने तो रमा एकादशी के दिन अन्न-जल ग्रहण न करने के कारण प्राण त्याग दिए थे। मुझे बड़ा विस्मय हो रहा है कि ऐसा विचित्र और सुंदर नगर जिसको न तो मैंने कभी सुना और न कभी देखा है, आपको किस प्रकार प्राप्त हुआ?’

इस पर सोभन ने कहा – ‘हे ब्राह्मण! यह सब कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी के व्रत का फल है। इसी से मुझे यह अनुपम नगर प्राप्त हुआ है, किंतु यह अस्थिर है।’

सोभन की बात सुन ब्राह्मण बोला – ‘हे राजन! यह अस्थिर क्यों है और स्थिर किस प्रकार हो सकता है, सों आप मुझे समझाइए। यदि इसे स्थिर करने के लिए मैं कुछ कर सका तो अवश्य ही करूंगा।’ राजा सोभन ने कहा – ‘हे ब्राह्मण, मैंने वह व्रत विवश होकर तथा श्रद्धारहित किया था। उसके प्रभाव से मुझे यह अस्थिर नगर प्राप्त हुआ, परंतु यदि तुम इस वृत्तांत को मेरी पत्नी चन्द्रभागा से कहोगे तो वह इसको स्थिर बना सकती है।’

राजा सोभन की बात सुन ब्राह्मण अपने नगर को लौट आया और उसने चन्द्रभागा को सारा वृत्तांत कह सुनाया। इस पर राजकन्या चन्द्रभागा अचंभित हो कर बोली- ‘हे ब्राह्मण देव! आप क्या यह सब दृश्य प्रत्यक्ष देखकर आए हैं?’

चन्द्रभागा की बात सुन ब्राह्मण बोला – ‘हे राजकन्या! मैंने तेरे पति सोभन तथा उसके नगर को प्रत्यक्ष देखा है, किंतु वह नगर अस्थिर है। तू कोई ऐसा उपाय कर जिससे कि वह स्थिर हो जाए और तेरा पति तुझ से मिल सके।

ब्राह्मण की बात सुन चन्द्रभागा बोली – ‘हे ब्राह्मण देव! आप मुझे उस नगर में ले चलिए, मैं अपने पति को देखना चाहती हूं। मैं अपने व्रत के प्रभाव से उस नगर को स्थिर बना दूंगी।’

चन्द्रभागा के वचनों को सुनकर वह ब्राह्मण उसे मंदराचल पर्वत के पास वामदेव के आश्रम में ले गया। वामदेव ने उसकी कथा को सुनकर चन्द्रभागा का मंत्रों से अभिषेक किया। चन्द्रभागा मंत्रों तथा व्रत के प्रभाव से दिव्य देह धारण करके पति के पास चली गई। सोभन ने अपनी पत्नी चन्द्रभागा को देखकर उसे प्रसन्नतापूर्वक आसन पर अपने पास बैठा लिया।

चन्द्रभागा ने कहा – ‘हे स्वामी! अब आप मेरे पुण्य को सुनिए, जब मैं अपने पिता के घर में आठ वर्ष की थी, तब ही से मैं सारे एकादशी का व्रत विधि विधान से कर रही हूं। उन्हीं व्रतों के प्रभाव से आपका यह नगर स्थिर हो जाएगा। उसके पश्चात चन्द्रभागा दिव्य स्वरूप धारण करके तथा दिव्य वस्त्रालंकारो से सजकर अपने पति के साथ सुखपूर्वक रहने लगी।

हे अर्जुन! यह मैंने रमा एकादशी का माहात्म्य कहा है। जो मनुष्य रमा एकादशी के व्रत को करते हैं, उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य रमा एकादशी का माहात्म्य सुनते हैं, वह अंत समय में विष्णु लोक को जाते हैं।”

रमा एकादशी पर ऐसे करें पूजा

रमा एकादशी के दिन विष्णु भगवान के प्रति श्रद्धा रखें। प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। उसके बाद पूर्ण भक्ति भाव से विष्णु भगवान और माता लक्ष्मी का पूजन करें।  भगवान को प्रसाद का भोग लगाएं और ध्यान रखें कि इस प्रसाद को भक्तों में वितरित करें।इस दिन तुलसी पूजन करना भी शुभ माना जाता है।

 

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