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* @param bool $number_format Whether to format the number (eg. 9,999) or not (eg. 9999)
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* Do Query
*
* @param $instance
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The post Holi 2022 : होली की रात को किए जाने वाले कुछ ज्योतिष उपाय appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>भारत समेत दुनियाभर में होली (Holi 2022) की तैयारी जोरों पर है। हमारे देश में प्राचीन समय से ही टोटके और उपायों का बहुत ही प्रचलित है। अक्सर हम देखते हैं कि किसी भी तरह के शुभ कार्यों की शुरुआत करने से पहले कुछ न कुछ उपाय जरूर किये जाते हैं ताकि काम सफलतापूर्वक पूर्ण हो। ज्योतिष शास्त्रों में होली (Holi) की रात को सिद्धि की रात कहा गया है और दिन किए गए उपाय बहुत ही जल्दी शुभ फल प्रदान करते हैं।
मान्यता है कि इस दिन ( Holi 2022) नकारात्मक और सकारात्मक उर्जा दोनों ही बहुत सक्रिय रहते हैं। इसलिए इस दिन का प्रयोग सदियों से सिद्धियां हासिल करने के लिए लोग करते आए हैं। अगर आप भी किसी परेशानी से जूझ रहे हैं तो इस दिन नीचे बताए उपायों को आजमाकर लाभ और उन्नति प्राप्त कर सकते हैं।
होली की रात चंद्रमा के उदय होने के बाद अपने घर की छत पर या खुली जगह, जहां से चांद नजर आए, वहां खड़े हो जाएं। फिर चंद्रमा का स्मरण करते हुए चांदी की प्लेट में सूखे छुहारे तथा कुछ मखाने रखकर शुद्ध घी के दीपक के साथ धूप एवं अगरबत्ती अर्पित करें। अब दूध से चंद्रमा को अर्घ्य दें।
अर्घ्य के बाद सफेद मिठाई तथा केसर मिश्रित साबूदाने की खीर अर्पित करें। चंद्रमा से समृद्धि प्रदान करने का निवेदन करें। बाद में प्रसाद और मखानों को बच्चों में बांट दें। फिर लगातार आने वाली प्रत्येक पूर्णिमा की रात चंद्रमा को दूध का अर्घ्य दें। कुछ ही दिनों में आप महसूस करेंगे कि आर्थिक संकट दूर होकर समृद्धि निरंतर बढ़ रही है।
होली ( Holi 2022) की रात उत्तर दिशा में बाजोट (पटिए) पर सफेद कपड़ा बिछाकर उस पर मूंग, चने की दाल, चावल, गेहूं, मसूर, काले उड़द एवं तिल की ढेरी बनाएं। अब उस पर नवग्रह यंत्र स्थापित करें। उस पर केसर का तिलक करें, घी का दीपक लगाएं एवं नीचे लिखे मंत्र का जाप करें। जाप स्फटिक की माला से करें। जाप पूरा होने पर यंत्र को पूजा स्थान पर स्थापित करें, ग्रह अनुकूल होने लगेंगे।
मंत्र- ब्रह्मा मुरारी स्त्रीपुरान्तकारी भानु शशि भूमि-सुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्र शनि राहु केतव: सर्वे ग्रहा शांति करा भवंतु ..
एकाक्षी नारियल को लाल कपड़े में गेहूं के आसन पर स्थापित करें और सिंदूर का तिलक करें। अब मूंगे की माला से नीचे लिखे मंत्र का जाप करें। 21 माला जाप होने पर इस पोटली को दुकान में ऐसे स्थान पर टांग दें, जहां ग्राहकों की नजर इस पर पड़ती रहे। इससे व्यापार में सफलता मिलने के योग बन सकते हैं।
मंत्र- ऊं श्रीं श्रीं श्रीं परम सिद्धि व्यापार वृद्धि नम :.
दूसरे पान के पत्ते से उस पत्ते को ढक दें और 7 बार होलिका की परिक्रमा करते हुए ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। परिक्रमा समाप्त होने पर सारी सामग्री होलिका में अर्पित कर दें तथा पूजन के बाद प्रणाम करके घर वापस आ जाएं। अगले दिन पान के पत्ते वाली सारी नई सामग्री ले जाकर पुन: यही क्रिया करें। जो धातुएं आपने दबाई हैं, उनको निकाल लाएं।
फिर किसी सुनार से तीनों धातुओं को मिलाकर अपनी मध्यमा उंगली के माप का छल्ला बनवा लें। 15 दिन बाद आने वाले शुक्ल पक्ष के गुरुवार को छल्ला धारण कर लें। इस उपाय से धन लाभ के योग बन सकते हैं।
होली के दिन सुबह एक साबूत पान पर साबूत सुपारी एवं हल्दी की गांठ शिवलिंग पर चढ़ाएं तथा पीछे पलटे बगैर अपने घर आ जाएं। यही प्रयोग अगले दिन भी करें। जल्दी ही आपके विवाह के योग बन सकते हैं।
होलिका दहन से पूर्व जब गड्ढा खोदें, तो सबसे पहले उसमें थोड़ी चांदी, पीतल व लोहा दबा दें। यह तीनों धातु सिर्फ इतनी मात्रा में होनी चाहिए, जिससे आपकी मध्यमा उंगली के नाप का छल्ला बन सके। इसके बाद विधि-विधान से दाण्डा रोपे। जब आप होलिका पूजन को जाएं, तो पान के एक पत्ते पर कपूर, थोड़ी-सी हवन सामग्री, शुद्ध घी में डुबोया लौंग का जोड़ा तथा बताशे रखें।
दूसरे पान के पत्ते से उस पत्ते को ढक दें और 7 बार होलिका की परिक्रमा करते हुए ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। परिक्रमा समाप्त होने पर सारी सामग्री होलिका में अर्पित कर दें तथा पूजन के बाद प्रणाम करके घर वापस आ जाएं। अगले दिन पान के पत्ते वाली सारी नई सामग्री ले जाकर पुन: यही क्रिया करें। जो धातुएं आपने दबाई हैं, उनको निकाल लाएं।
फिर किसी सुनार से तीनों धातुओं को मिलाकर अपनी मध्यमा उंगली के माप का छल्ला बनवा लें। 15 दिन बाद आने वाले शुक्ल पक्ष के गुरुवार को छल्ला धारण कर लें। इस उपाय से धन लाभ के योग बन सकते हैं।
अगर आप किसी बीमारी से पीडि़त हैं, तो इसके लिए भी होली की रात को खास उपाय करने से आपकी बीमारी दूर हो सकती है। होली की रात आप नीचे लिखे मंत्र का जाप तुलसी की माला से करें।
मंत्र- ऊं नमो भगवते रुद्राय मृतार्क मध्ये संस्थिताय मम शरीरं अमृतं कुरु कुरु स्वाहा
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]]>The post Rama Ekadashi 2021 : माता लक्ष्मी को समर्पित रमा एकादशी व्रत, जाने महत्व, कथा शुभ मुहूर्त appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>कार्तिक मास भगवान विष्णु को समर्पित होता है। भगवान विष्णु इस समय शयन कर रहे होते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को ही वो चार मास बाद जागते हैं। लेकिन कृष्ण पक्ष में जितने भी त्यौहार आते हैं उनका संबंध किसी न किसी तरीके से माता लक्ष्मी से भी होता है।माता लक्ष्मी जी का एक नाम रमा भी है इसलिए इस एकादशी को रमा एकादशी कहा जाता है।
दिनांक : 01 नवम्बर 2021
वार : सोमवार
एकादशी तिथि प्रारम्भ – 31 नवम्बर 2021 को 02:27 पी एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त – 01 नवम्बर 2021 को 01:21 पी एम बजे
पारण( व्रत तोड़ने की) तिथि: 2 नवम्बर 2021
पारण ( व्रत तोड़ने का) समय: 06:34 ए एम से 08:46 ए एम
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय – 11:31 ए एम
अर्जुन ने कहा- “हे श्रीकृष्ण! आप मुझे कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा सुनाइए। इस एकादशी का क्या नाम है तथा इसमें किस देवता का पूजन किया जाता है? इस एकादशी का व्रत करने से किस फल की प्राप्ति होती है?कृपा करके सब विस्तारपूर्वक बतायें”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे अर्जुन! कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम रमा एकादशी है। इसका व्रत करने से सभी पापों का शमन होता है। इसकी कथा इस प्रकार है,
पौराणिक काल में मुचुकुंद नाम का राजा राज्य करता था। सभी देवता उसके मित्र थे। वह बड़ा सत्यवादी तथा विष्णुभक्त था। उसका राज्य बिल्कुल निष्कंटक था। उसकी चन्द्रभागा नाम की एक कन्या थी, जिसका विवाह उसने राजा चन्द्रसेन के पुत्र सोभन से कर दिया। वह राजा एकादशी का व्रत बड़े ही भक्ति भाव से नियमपूर्वक करता था और उसके राज्य में सभी इस नियम का पालन करते थे।
एक बार की बात है कि सोभन अपनी ससुराल आया हुआ था। वह कार्तिक का महीना था। उसी मास में महापुण्यदायिनी रमा एकादशी आ गई। इस दिन सभी व्रत रखते थे। चन्द्रभागा ने सोचा कि मेरे पति तो बड़े कमजोर हृदय के हैं, वे एकादशी का व्रत कैसे करेंगे, जबकि पिता के यहां तो सभी को व्रत करने की आज्ञा है। मेरा पति अगर राजाज्ञा मान कर उपवास करेंगे तो बहुत कष्ट होगा। चन्द्रभागा को जिस बात का डर था वही हुआ। राजा मुचुकुंद ने आदेश जारी किया कि इस समय उनका दामाद राज्य में पधारा हुआ है, अतः सारी प्रजा विधानपूर्वक एकादशी का व्रत करे। उसे सुनकर सोभन अपनी पत्नी के पास गया और बोला – ‘हे प्रिय! तुम मुझे कुछ उपाय बतलाओ, क्योंकि मैं उपवास नहीं कर सकता, यदि मैं उपवास करूंगा तो अवश्य ही मर जाऊंगा।’
पति की बात सुन चन्द्रभागा ने कहा – ‘हे स्वामी! मेरे पिता के राज्य में एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं कर सकता। यहां तक कि राज्य के पालतू जानवर हाथी, घोड़ा, ऊंट आदि भी अन्न, जल आदि ग्रहण नहीं करते, फिर भला मनुष्य कैसे भोजन कर सकते हैं? यदि आप उपवास नहीं कर सकते तो किसी दूसरे स्थान पर चले जाइए, क्योंकि यदि आप यहां रहेंगे तो आपको व्रत तो अवश्य ही करना पड़ेगा।’
पत्नी की बात सुन सोभन ने कहा – ‘हे प्रिय! तुम्हारी राय उचित है, परंतु मैं व्रत करने के डर से किसी दूसरे स्थान पर नहीं जाऊंगा, अब मैं व्रत अवश्य ही करूंगा, परिणाम चाहे कुछ भी और भाग्य के लिखे को भला कौन टाल सकता है।’
सभी के साथ सोभन ने भी एकादशी का व्रत किया और भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल होने लगा। सूर्य नारायण भी अस्त हो गए और जागरण के लिए रात्रि भी आ गई। वह रात सोभन को असहनीय दुख देने वाली थी। दूसरे दिन सूर्योदय होने से पूर्व ही भूख-प्यास के कारण सोभन के प्राण-पखेरू उड़ गए।
राजा ने सोभन के मृत शरीर को जल-प्रवाह करा दिया और अपनी पुत्री मायके में रहकर एकादशी का व्रत करने और भगवान विष्णु की कृपा पर भरोसा रखने को कहा। चन्द्रभागा अपने पिता की आज्ञानुसार अपने पिता के घर रहकर एकादशी के व्रत करने लगी।
उसके व्रत के प्रभाव से सोभन को जल से निकाल लिया गया और भगवान विष्णु की कृपा से उसे मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से परिपूर्ण तथा शत्रु रहित देवपुर नाम का एक उत्तम नगर प्राप्त हुआ। वह वहां का राजा बन गया। उन्हीं दिनों मुचुकुंद नगर में रहने वाला एक ब्राह्मण तीर्थयात्रा के लिए निकला हुआ था। घूमते-घूमते वह सोभन के राज्य में जा पहुंचा। राजा सोभन को देख ब्राह्मण को आश्चर्य हुआ और सोभन से कहा – ‘हे राजन! आपने तो रमा एकादशी के दिन अन्न-जल ग्रहण न करने के कारण प्राण त्याग दिए थे। मुझे बड़ा विस्मय हो रहा है कि ऐसा विचित्र और सुंदर नगर जिसको न तो मैंने कभी सुना और न कभी देखा है, आपको किस प्रकार प्राप्त हुआ?’
इस पर सोभन ने कहा – ‘हे ब्राह्मण! यह सब कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी के व्रत का फल है। इसी से मुझे यह अनुपम नगर प्राप्त हुआ है, किंतु यह अस्थिर है।’
सोभन की बात सुन ब्राह्मण बोला – ‘हे राजन! यह अस्थिर क्यों है और स्थिर किस प्रकार हो सकता है, सों आप मुझे समझाइए। यदि इसे स्थिर करने के लिए मैं कुछ कर सका तो अवश्य ही करूंगा।’ राजा सोभन ने कहा – ‘हे ब्राह्मण, मैंने वह व्रत विवश होकर तथा श्रद्धारहित किया था। उसके प्रभाव से मुझे यह अस्थिर नगर प्राप्त हुआ, परंतु यदि तुम इस वृत्तांत को मेरी पत्नी चन्द्रभागा से कहोगे तो वह इसको स्थिर बना सकती है।’
राजा सोभन की बात सुन ब्राह्मण अपने नगर को लौट आया और उसने चन्द्रभागा को सारा वृत्तांत कह सुनाया। इस पर राजकन्या चन्द्रभागा अचंभित हो कर बोली- ‘हे ब्राह्मण देव! आप क्या यह सब दृश्य प्रत्यक्ष देखकर आए हैं?’
चन्द्रभागा की बात सुन ब्राह्मण बोला – ‘हे राजकन्या! मैंने तेरे पति सोभन तथा उसके नगर को प्रत्यक्ष देखा है, किंतु वह नगर अस्थिर है। तू कोई ऐसा उपाय कर जिससे कि वह स्थिर हो जाए और तेरा पति तुझ से मिल सके।
ब्राह्मण की बात सुन चन्द्रभागा बोली – ‘हे ब्राह्मण देव! आप मुझे उस नगर में ले चलिए, मैं अपने पति को देखना चाहती हूं। मैं अपने व्रत के प्रभाव से उस नगर को स्थिर बना दूंगी।’
चन्द्रभागा के वचनों को सुनकर वह ब्राह्मण उसे मंदराचल पर्वत के पास वामदेव के आश्रम में ले गया। वामदेव ने उसकी कथा को सुनकर चन्द्रभागा का मंत्रों से अभिषेक किया। चन्द्रभागा मंत्रों तथा व्रत के प्रभाव से दिव्य देह धारण करके पति के पास चली गई। सोभन ने अपनी पत्नी चन्द्रभागा को देखकर उसे प्रसन्नतापूर्वक आसन पर अपने पास बैठा लिया।
चन्द्रभागा ने कहा – ‘हे स्वामी! अब आप मेरे पुण्य को सुनिए, जब मैं अपने पिता के घर में आठ वर्ष की थी, तब ही से मैं सारे एकादशी का व्रत विधि विधान से कर रही हूं। उन्हीं व्रतों के प्रभाव से आपका यह नगर स्थिर हो जाएगा। उसके पश्चात चन्द्रभागा दिव्य स्वरूप धारण करके तथा दिव्य वस्त्रालंकारो से सजकर अपने पति के साथ सुखपूर्वक रहने लगी।
हे अर्जुन! यह मैंने रमा एकादशी का माहात्म्य कहा है। जो मनुष्य रमा एकादशी के व्रत को करते हैं, उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य रमा एकादशी का माहात्म्य सुनते हैं, वह अंत समय में विष्णु लोक को जाते हैं।”
रमा एकादशी के दिन विष्णु भगवान के प्रति श्रद्धा रखें। प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। उसके बाद पूर्ण भक्ति भाव से विष्णु भगवान और माता लक्ष्मी का पूजन करें। भगवान को प्रसाद का भोग लगाएं और ध्यान रखें कि इस प्रसाद को भक्तों में वितरित करें।इस दिन तुलसी पूजन करना भी शुभ माना जाता है।
The post Rama Ekadashi 2021 : माता लक्ष्मी को समर्पित रमा एकादशी व्रत, जाने महत्व, कथा शुभ मुहूर्त appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>The post Vishnu Sahasranamam Stotram-विष्णु सहस्रनाम appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
]]>The post रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा को क्यों मनाया जाता है ? जाने पूरी कहानी appeared first on हिंदू व्रत, त्योहार एवं उत्सव.
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दैत्य कुल के राजा बलि ने देवताओं के प्रमुख इंद्र का आसन पाने के लिए सौ यज्ञ करने का संकल्प लिया। राजा बलि जब सौवां यज्ञ कर रहे थे तबइंद्र सहित सभी देवताओं की प्रार्थना पर स्वयं भगवान विष्णु ही वामन का रूप धर कर बलि की यज्ञशाला में आए। भगवान वामन ने राजा बलि सेअपने लिए तीन पग भूमि मांगी। दैत्यगुरू शुक्राचार्य के मना करने पर भी बलि ने भगवान वामन को तीन पग भूमि दे दी।
वामन ने अपने शरीर को बढ़ा दो पगों में ही पृथ्वी व स्वर्ग को नाप लिया तथा तीसरा पग दैत्यराज बलि के मस्तक पर रखा। बलि की भक्ति से प्रसन्नहोकर भगवान वामन ने बलि से वरदान मांगने को कहा तो बलि ने वरदान में भगवान विष्णु को अपने पाताललोक का द्वारपाल होना ही मांग लिया।
इस कारण भगवान विष्णु वैकुंठलोक छोड़कर पाताललोक में राजा बलि के द्वाररक्षक हो गए। भगवती लक्ष्मी अपने पति विष्णु को खोजने लगीं और खोजते हुए पाताललोक पहुंचीं तथा भगवान विष्णु को अपने साथ चलने के लिए कहने लगीं।
भगवान विष्णु ने बलि को दिए वरदान के अनुसार जाने से मना कर दिया। तब भगवती लक्ष्मी ने दैत्यराज बलि को अपना भाई बनाते हुए रक्षासूत्र बांधकर अपने पति को मांग लिया।
उस दिन श्रावणी पूर्णिमा का ही दिन था। बलि ने अपनी बहन लक्ष्मी की इच्छा का सम्मान करते हुए भगवान विष्णु को ससम्मान उनके साथ भेज दिया। तब से आज तक रक्षाबंधन का पवित्र पर्व चला आ रहा है।
आज अपने पुरोहित से रक्षासूत्र बंधवाना चाहिए। यदि भद्रा हो तो उसे टालकर सविधि ऋषियों का पूजन करने के बाद ब्राह्मण से पुरूषों को दाएं हाथ और महिलाओं को बाएं हाथ पर रक्षासूत्र बंधवाना चाहिए।
रक्षासूत्र बांधते समय इस मंत्र का उच्चारण अनिवार्य रूप से करना चाहिए-
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।
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